Thursday, April 18, 2019

दुनिया की सबसे कठिन चुनौती का सामना

बीते कई दशकों से इस तरह के समुद्री सैनिकों की बात हो रही है, लेकिन विशेषज्ञों के मुताबिक अब ये सेना जो रणनीतिक उद्देश्यों को पूरा करने के लिए कहीं ज्यादा सक्षम हो चुकी है.
आरएसआईएस के रक्षा विशेषज्ञ कोलिन कोह स्वी लीन बताते हैं कि इन समुद्री सैनिकों की शुरुआत चाइनीज सिविल वॉर के समय से ही हो गई थी. लीन ने बीबीसी मॉनिटरिंग को बताया, "पीएलएएन और सीसीजी के गठन के बाद भी समुद्री नौ सैनिक प्रभावी पुलिस फोर्स बने रहे."
डेरेक ग्रोसमैन कहते हैं कि पीएलएएन इन नौकाओं को प्रशिक्षिण, उपकरण और अनुदान सब मुहैया कराता है.
चीनी ने अपनी नौसेना का पूरी तरह से आधुनिकीकरण किया है, लेकिन उसने इन नौकाओं का इस्तेमाल भी जारी रखा है. इसकी एक वजह तो यही है कि इसे बहुत आसानी और बहुत तेजी से बनाया जा सकता है.
कोलिन बताते हैं, "अब नौकाओं के बेड़े कहीं ज्यादा अत्याधुनिक हैं, खासकर उनमें मौजूद हथियारों की रेंज जिस तरह से बेहतर हुई है, उसके चलते सेना कुछ समय के लिए खुले समुद्र में इन नौकाओं के जरिए अपना अभियान चला सकती है."
हालांकि चीनी सरकार इन नौकाओं के अस्तित्व को कमतर बताने की कोशिशों में जुटी है लेकिन चीन की सरकारी मीडिया (एकाध बार ही सही) ने इनके कामकाज के बारे में इन्हें समुद्र से लड़ने वाले किले या हल्की फौज बताया है.
चाइना डेली ने 2016 के अपने एक लेख में बताया है, "पीपल्स लिबरेशन आर्मी अपनी नौ सेना को मजबूत कर रहा है. इसके लिए दर्जनों नए जहाज और नौकाएं तैनात की गई हैं, यह ऐसी सेना है जिस पर लोगों की ज्यादा नजर नहीं गई है. यह अपनी ऑपरेशनल क्षमता को भी बेहतर कर रही है. इस सेना में अधिकांश स्थानीय मछुआरों को शामिल किया गया है."
2014 में चीन के आधिकारिक सैन्य समाचार पत्र पीएलए डेली ने इस पर दो टूक लिखा था, "क्षद्म आवरण में ये सैनिक जैसे हैं. लेकिन आवरण हटाने पर ये कानून का पालन करने वाले मछुआरे हैं."
अमरीकी नेवल वॉर कॉलेज में रणनीति मसलों के प्रोफेसर एंड्रूय इरिक्सन ने इन सैनिकों के लिए एक नया शब्द गढ़ा है- लिटिल ब्लू मैन. इस शब्द का चयन उन्होंने रूस और यूक्रेन के उन सैनिकों के आधार पर किया है, जिनकी पहचान स्पष्ट नहीं होती है- उन्हें लिटिल ग्रीन मैन कहा जाता है.
एंड्रूय इरिक्सन के मुताबिक ऐसी स्थिति से निपटने का सबसे बेहतरीन तरीका तो यही है कि नौकाओं की गतिविधियों के बारे में ज्यादा से ज्यादा प्रचारित करें और उस क्षेत्र में अपनी उपस्थिति को कायम रखें.
इरिक्सन मुहावरे के जरिए कहते हैं, "सूर्य की रोशनी ही सबसे बेहतर कीटाणुनाशक होती है."
संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है कि दुनिया में बच्चों से ज़्यादा बुजुर्ग हो गए हैं.
2018 के अंत में 65 साल से अधिक उम्र के बुजुर्गों की संख्या 5 साल से कम उम्र के बच्चों से अधिक हो गई.
संसार में 65 साल से ज़्यादा उम्र के बूढ़ों की तादाद करीब 70.5 करोड़ है, जबकि शून्य से चार साल के बच्चे करीब 68 करोड़ हैं.
ये रुझान जारी रहे तो 2050 में शून्य से चार साल के हर बच्चे पर 65 साल से ज़्यादा उम्र के दो बुजुर्ग होंगे.
जनसांख्यिकी विशेषज्ञ पिछले कई दशकों से इस रुझान पर नज़र रखे हुए हैं. ज़्यादातर देशों में इंसान की जीवन प्रत्याशा बढ़ रही है. वे लंबे वक़्त तक जी रहे हैं और कम बच्चे पैदा कर रहे हैं.
सका आप पर क्या प्रभाव होगा? कहीं ऐसा तो नहीं कि आप पर इसका असर शुरू हो गया हो.
वाशिंगटन यूनिवर्सिटी में इंस्टीट्यूट फ़ॉर हेल्थ मेट्रिक्स एंड इवैलुएशन के डायरेक्टर क्रिस्टोफर मरे कहते हैं, "बच्चे बहुत कम होंगे और 65 साल से ज़्यादा उम्र के बूढ़े ढेर सारे होंगे. इससे वैश्विक समाज को बनाए रखना बहुत मुश्किल होगा."
मरे ने 2018 के एक पेपर भी लिखा था जिसमें उनका कहना है कि दुनिया के लगभग आधे देशों में आबादी के मौजूदा आकार को बरकरार रखने के लिए पर्याप्त बच्चे नहीं हैं.
वह कहते हैं, "पोते-पोतियों से अधिक दादा-दादी वाले समाज में इसके सामाजिक और आर्थिक परिणामों के बारे में सोचिए."
विश्व बैंक के मुताबिक 1960 में महिलाओं की औसत प्रजनन दर लगभग 5 बच्चों की थी. करीब 60 साल बाद यह आधे से भी कम (2.4) रह गई है.
इस दौरान हुई सामाजिक-आर्थिक तरक्की ने धरती पर जन्म लेने वालों को फ़ायदा पहुंचाया है.
1960 में लोग औसत रूप से 52 साल जीते थे. 2017 में जीवन प्रत्याशा बढ़कर 72 साल हो गई है.
हम लंबे समय तक जी रहे हैं. जैसे-जैसे हमारी उम्र बढ़ रही है हम ज़्यादा संसाधनों की मांग कर रहे हैं. इससे पेंशन और स्वास्थ्य सेवा क्षेत्रों पर दबाव बढ़ रहा है.

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